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लखनऊ उत्तर प्रदेश। 1,कोरोनाकाल के साइलेंट हीरो .प्राथमिक उपचार मे झोलाछाप डॉक्टरों की भूमिका. सुविधाए देने की उठी मांग. 2, गांव गांव तक जीवन रक्षक बने झोलाछाप डॉक्टर. सरकार से मान्यता और सुविधा की मांग तेज. 3, आपदा मे बने सहारा कोरोनाकाल मे झोलाछाप डॉक्टरों का अहम योगदान. सुविधाए देने की मांग. 4,ग्रामीण स्वास्थ्य की रीढ झोलाछाप डॉक्टर. अब सम्मान और सुविधा की दरकार. 5,कोरोनाकाल मे निभाई जान बचाने की जिम्मेदारी अब झोलाछाप डॉक्टरों को चाहिए सरकारी सहारा । लखनऊ उत्तरप्रदेश से राजेश कुमार यादव की खास रिपोर्ट

1. “कोरोनाकाल के साइलेंट हीरो: प्राथमिक उपचार में झोला छाप डॉक्टरों की भूमिका, सुविधाएं देने की उठी मांग”

2. “गांव-गांव तक जीवन रक्षक बने झोला छाप डॉक्टर, सरकार से मान्यता और सुविधा की मांग तेज”

3. “आपदा में बने सहारा: कोरोनाकाल में झोला छाप डॉक्टरों का अहम योगदान, सुविधाएं देने की मांग”

4. “ग्रामीण स्वास्थ्य की रीढ़ झोला छाप डॉक्टर, अब सम्मान और सुविधा की दरकार”

5. “कोरोना काल मे निभाई जान बचाने की जिम्मेदारी, अब झोला छाप डॉक्टरों को चाहिए सरकारी सहारा”

लखनऊ उत्तर प्रदेश से राजेश कुमार यादव की खास रिपोर्ट

कोरोना महामारी के भयावह दौर में जब बड़े-बड़े अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन और डॉक्टरों की भारी कमी देखने को मिल रही थी, तब गांव-देहात और दूरदराज़ इलाकों में झोलाछाप डॉक्टर ही आम जनता के लिए जीवन रक्षक साबित हुए। अपनी जान की परवाह किए बिना इन डॉक्टरों ने संक्रमित मरीजों का इलाज किया और समय पर प्राथमिक उपचार देकर न जाने कितनी जिंदगियां बचाईं। आज जरूरत महसूस की जा रही है कि सरकार ऐसे जमीनी स्तर पर काम करने वाले झोलाछाप डॉक्टरों को भी जरूरी सुविधाएं और सुरक्षा प्रदान करे।

कोरोनाकाल में शहरों के लोग जहां बड़े अस्पतालों का रुख कर रहे थे, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब, मजदूर और असहाय लोगों के लिए झोलाछाप डॉक्टर ही आखिरी सहारा बने। कई गांवों में तो स्वास्थ्य केंद्र दूर होने के कारण मरीजों तक समय पर एंबुलेंस भी नहीं पहुंच पाती थी। ऐसे में यही डॉक्टर दिन-रात मरीजों की सेवा में जुटे रहे। बुखार, खांसी, सांस की तकलीफ से जूझ रहे मरीजों का प्राथमिक उपचार कर उन्होंने अनेक परिवारों को उजड़ने से बचाया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इन डॉक्टरों ने अपनी सीमित संसाधनों में भी सेवा भाव को प्राथमिकता दी। कई बार दवा न मिलने पर खुद अपनी जेब से मरीजों को दवा उपलब्ध कराई। कुछ झोलाछाप डॉक्टर तो बीमार पड़ गए, लेकिन फिर ठीक होकर दोबारा मरीजों की सेवा में लग गए। उस दौर में न तो उनके पास कोई विशेष सुरक्षा किट थी और न ही सरकारी स्तर पर कोई सहयोग, फिर भी उन्होंने पीछे हटने का नाम नहीं लिया।

हालांकि आज भी झोलाछाप डॉक्टरों को अवैध मानकर कार्रवाई की जाती है, लेकिन यह भी सच्चाई है कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था इन्हीं के सहारे टिकी हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार इन्हें उचित प्रशिक्षण देकर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ दे, तो ग्रामीण इलाकों में इलाज की व्यवस्था और मजबूत हो सकती है। साथ ही गलत इलाज की संभावनाएं भी कम होंगी।

अब समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों द्वारा सरकार से यह मांग जोर पकड़ रही है कि कोरोनाकाल में अहम भूमिका निभाने वाले झोलाछाप डॉक्टरों को पहचान पत्र, आवश्यक दवाइयों की सुविधा, प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही इनकी सेवाओं को एक तय दायरे में वैध रूप देकर ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा का हिस्सा बनाया जाए।

सरकार अगर इस दिशा में ठोस कदम उठाती है तो आने वाले समय में किसी भी आपदा के दौरान गांव-देहात के मरीजों को समय पर प्राथमिक उपचार मिल सकेगा और झोलाछाप डॉक्टर भी सम्मान के साथ सुरक्षित तरीके से अपनी सेवा जारी रख सकेंगे।

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